रामगढ़ शेखावाटी: श्रीकृष्ण गौशाला द्वारा आजीवन सदस्यों की सूची को अपडेट करते हुए निष्पक्ष एवं पारदर्शी तरीके से मतदाता सूची तैयार करने के लिए सदस्यों के सत्यापन (केवाईसी) का कार्य कराया जा रहा है जिसके प्रथम चरण में श्रीकृष्ण गौशाला रामगढ़ के स्थानीय सहित देश के विभिन्न स्थानों में रहने वाले 1607 सदस्यों ने अपने सत्यापन फॉर्म गौशाला के कार्यालय में जमा कराए हैं।
क्यों आवश्यकता पड़ी सत्यापन की- ऐसा सुना जा रहा है कि श्रीकृष्ण गौशाला रामगढ़ की सदस्यता सूची अपडेट नहीं है। सदस्यों के पते, मोबाइल नम्बर आदि अंकित नहीं है या आधे अधूरे दर्ज है। दिवंगत सदस्यों के बारे में कोई सूचना नहीं होने के कारण उनका नाम भी सदस्यता सूची में यथावत चल रहे है। चौंकाने वाली बात तो यह है कि पिछले चुनावों में प्रॉक्सी का दुरूपयोग करते हुए कतिपय लोगों ने दिवंगत लोगों की तरफ से भी वोट डाल दिये। गौशाला प्रबंध समिति के चुनाव में इस प्रकार की अनियमितताओं को राकने के उद्देश्य से आजीवन सदस्यों का सत्यापन अभियान चलाया गया है। गौशाला के 2488 सदस्यों में से 1607 सदस्यों ने अपने सत्यापन फॉर्म पूर्ण करके भिजवाये हैं। करीबन 59 सदस्यों के दिवंगत होने की जानकारी मिली है। कई सदस्य स्थायी रूप से विदेश रहने लग गये है जिनकी कोई सूचना नहीं है।
प्राप्त सत्यापन फॉर्मों की दुबारा जांच क्यों? पिछले चुनावों में जिस तरह कुछ लोगों द्वारा येन केन प्रकारेन डाक विभाग, कोरियर से ही प्रॉक्सी प्राप्त कर सदस्यों के फर्जी हस्ताक्षर कर फर्जी मतों का जमकर उपयोग किया गया। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि दिवंगत व्यक्तियों या विदेश में रहने वाले व्यक्तियों या जिनका लम्बे समय से कोई अता-पता नहीं है, उनके भी वोट डाले गए। अब, कुछ लोगों द्वारा सदस्यता सत्यापन में मामले में भी उसी खेल को दोहराया गया। उन्होंने किसी भी उपाय से या सदस्यों को विश्वास में लेकर व उनकी आईडी व फोटो प्राप्त कर एक साथ कई फार्मों में सदस्यों के फर्जी हस्ताक्षर करके, सत्यापन शुल्क दो सौ रूपयों का भी स्वयं ही भुगतान करके सत्यापन फॉर्मों की पूर्ति कर गौशाला कार्यालय में जमा करा दिये। ऐसा कार्य करने वाले कुछ लोगों के नाम भी सार्वजनिक रूप से सामने लाये जा रहे हैं लेकिन हम इसकी कोई प्रामाणिक जानकारी न होने के कारण नाम प्रकाशित करने में असमर्थ है। अब जाहिर है इस प्रकार दुराशय के साथ कपटपूर्ण तरीके से पूर्ण किये गये और गौशाला कार्यालय में जमा करवाये गये सत्यापन फॉर्मों का शक के घेरे में आना स्वाभाविक है। यहां इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे व्यक्तियों ने संबंधित सदस्यों की सहमति से ऐसा किया हो। वहीं दूसरी ओर इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि दिवंगत या ऐसे लोगों के भी फॉर्म जमा हुए होंगे जिनका लम्बे समय से कोई अता-पता नहीं है। ऐसी स्थिति में प्राप्त हुए सत्यापन फॉर्मों की पुन: जांच करवाना किसी भी तरह से अनुचित नहीं कहा जा सकता। प्राप्त जानकारी के अनुसार श्रीकृष्ण गौशाला प्रबंध समिति ने इन फार्मों की जांच के लिए रामगढ़ से बाहर के सेवानिवृत वरिष्ठ राजकीय अधिकारी के नेतृत्व वाली जांच कमेटी भी नियुक्त कर दी है।
शेष बचे सदस्यों का क्या होगा? क्या सदस्यता रद्द होगी? इस विषय में गोशाला प्रबंध समिति, प्रबुद्ध नागरिकों एवं विशेषज्ञों की बैठक में निर्णय लिया गया कि जो सदस्य सत्यापन फॉर्म भेजने से वंचित रह गये है उन्हें सत्यापन के दूसरे चरण में मौका दिया जायेगा। दूसरे चरण में सत्यापन की प्रक्रिया कुछ भिन्न व सख्त होगी ताकि पुन: कोई धांधली न कर सके। इसके लिए रूईया गली में बैंक ऑफ बड़ौदा के पास स्थित सोनी भवन में कार्यालय प्रारम्भ किया गया है। द्वितीय चरण के बारे में हम अगले लेख में विस्तार से चर्चा करेंगे। फिलहाल गौशाला द्वारा अस्थाई सदस्यता सूची का प्रकाशन किया जा रहा है जिसमें सभी सदस्यों को शामिल किया जायेगा लेकिन जिन सदस्यों के सत्यापन फॉर्म प्राप्त हो चुके है, जिनके अभी प्राप्त नहीं हुए है, जिनका स्वर्गवास हो चुका है आदि को विभिन्न रंगों से दर्शाया जायेगा। प्रथम चरण में प्राप्त फार्मों की जांच, दूसरे चरण में प्राप्त में सतपापन फार्मों व दिवंगत सदस्यों की प्रामाणिक सूचना के आधार पर अंतिम सूची तैयार की जायेगी।
क्या सत्यापन का शुल्क लिया जाना विधि संगत है? श्रीकृष्ण गोशाला का पंजीकरण सोसायटी के रूप में 1958 में हुआ था। तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप उस समय विधान-नियमावली तैयार की गई थी। लम्बे अंतराल में परिस्थितियों में काफी बदलाव हुआ। समय के अनुसार कुछ परम्पराएं एवं व्यवस्थाएं भी इसमें शामिल हो गई। लेकिन नियमानुसार किसी भी प्रकार संशोधन नहीं हो पाया। हालांकि आजीवन सदस्यों के पुन: सत्यापन या सत्यापन का कोई प्रावधान नहीं है लेकिन पिछले लम्बे समय से मतदाता सूची के अपडेट न होने के कारण प्रॉक्सी मतों के दुरूपयोग को किसी ने गम्भीरता से नहीं लिया। अधिकांश सदस्यों का गौशाला की गतिविधियों या गौसेवा से कोई लेना-देना नहीं रहा। गौशाला सदस्यता सूची में उनके नाम का उपयोग कतिपय स्वार्थी लोग उनके नाम की प्रॉक्सी हासिल करने के लिए ही करते रहे। कपटपूर्ण तरीके से प्रॉक्सी हासिल करने वालों के लिए ऐसे सदस्यों का नाम गौशाला की सदस्यता सूची में होना ही पर्याप्त है। उन सदस्यों का संसार में होना या न होना कोई मायने नहीं रखता। यह कहना गलत नहीं होगा कि ऐसे सदस्यों को गौशाला की गतिविधियों एवं व्यवस्थाओं से कोई वास्ता नहीं है। सदस्य का दायित्व वर्ष पर्यंत गौशाला की गतिविधियों की जानकारी रखना, यथाशक्ति गौशाला को आर्थिक सहयोग देना आदि भी है। लेकिन दुर्भाग्य से समय के चक्र में सदस्य की प्ररिभाषा ही बदल गई। ऐसे में सदस्यों का सत्यापन आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हो गया। और इस सत्यापन अभियान में गौशाला का अनावश्यक खर्चा भी लगा है ऐसे में सत्यापन शुल्क वसूलना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार पूरी तरह से उचित है। वैसे भी ऐसी वसूली राशि गौशाला कोष में ही जायेगी और सत्यापन अभियान पर हुए व्यय के बाद बची हुई राशि गौ हितार्थ ही काम में ली जायेगी। यदि कोई सदस्य गौशाला को 200 रूपये का साधारण सहयोग भी करने में सक्षम नहीं है वह क्या इसी लिए सदस्य बना हुआ है कि कोई उसके नाम की फर्जी प्रॉक्सी बना सके।
बहुत ने तो सदस्यता शुल्क ही नहीं चुकाया, किसी और ने ही दिया- कुछ वर्षों पहले गौशाला में ऐसा दौर चला था जब चुनाव जीतकर गौशाला प्रबंधन पर काबिज होने के इच्छुक व्यक्तियों ने अपने पैसे देकर काफी संख्या में ऐसे लोगों को गौशाला का आजीवन सदस्य बनाया जिन्हें भले ही गौशाला के क्रियाकलापों से कोई लेना देना न हो मगर ऐसे सदस्यों का नाम पैसे देने वालों के लिए वोअ के रूप में काम आ सके। धन्य है ऐसे लोगों की सोच पर। वे अपने पैसों से वोट के लालच में लोगों को आजीवन सदस्य तो बना गए मगर शायद वे भूल गए कि उनके जीवन की डोर स्वयं भगवान के हाथ है। आखिर कुछ तो चले गए, सबको जाना है लेकिन गौशाला जैसी पावन संस्था में गलत आचरण के बीज बोकर। ऐसी व्यवस्था को सुधारना आवश्यक है।
गौशाला के आजीवन सदस्यता सत्यापन के दूसरे चरण की चर्चा हम अगले लेख में करेंगे।


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