लेखक: विजय कुमार शर्मा राष्ट्रीय अध्यक्ष नेशनल जर्नलिस्ट एसोसिएशन
भारतीय लोकतंत्र में पत्रकारिता को सदैव सम्मानजनक स्थान प्राप्त रहा है। संविधान में स्पष्ट व्यवस्था न होने के बावजूद इसे “लोकतंत्र का चौथा स्तंभ” कहा गया है। आज़ादी की लड़ाई में जिस कलम ने शस्त्र से ज़्यादा धार दिखाई, उसी पत्रकारिता की साख आज धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। यह परिवर्तन केवल माध्यमों का नहीं, बल्कि मूल्यों, विश्वास और उद्देश्य का भी है।
स्वर्णिम अतीत की छाया
आज़ादी के पहले और उसके दशकों बाद तक पत्रकारिता जनचेतना का वाहक रही। समाचार पत्रों में छपी खबरें सरकारों को झुका देती थीं, प्रशासन हरकत में आ जाता था और घोटालेबाज़ों की रातों की नींद हराम हो जाती थी। पत्रकार को समाजसेवी समझा जाता था और कलम को तलवार से भी ज़्यादा धारदार माना जाता था।
टीवी का दौर: शोर ज़्यादा, असर कम
टीवी न्यूज़ चैनलों ने जब पत्रकारिता में कदम रखा, तो शुरुआत में ताजगी और त्वरितता लाए। लेकिन जल्द ही टीआरपी की दौड़ में सनसनी, चीख़-चिल्लाहट और बेतुकी बहसों ने कंटेंट की गहराई को निगल लिया। एक ही खबर को बार-बार दिखाना और भावनाओं के साथ खेलना आम हो गया। बावजूद इसके, टीवी भी प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता को पूरी तरह चुनौती नहीं दे सका।
डिजिटल दौर: सुविधाजनक, पर सतही
समाचार पत्रों ने खुद को डिजिटल माध्यमों में ढालते हुए वेबसाइट और ऐप्स की शुरुआत की। सूचना की गति तो बढ़ी, लेकिन गुणवत्ता की कसौटी पर कई बार यह माध्यम भी असफल रहा। विश्वसनीयता का जो वज़न प्रिंट मीडिया के पास था, वह डिजिटल माध्यमों में छिटकता गया।
सोशल मीडिया: आज़ादी या अराजकता?
आज स्थिति यह है कि जिसके पास स्मार्टफोन है, वह अपने को पत्रकार समझने लगा है। फेसबुक, यूट्यूब, व्हाट्सऐप और इंस्टाग्राम जैसे मंचों ने पत्रकारिता को लोकतांत्रिक तो बना दिया, लेकिन इससे पत्रकारिता के स्तर में भारी गिरावट भी आई।
फेक न्यूज़, झूठे तथ्य, सनसनीखेज और भावनात्मक रूप से भड़काऊ पोस्ट ने जनता को भ्रमित करना शुरू कर दिया।
“पेड न्यूज़” का ऐसा चलन बढ़ा कि अब पत्रकारिता व्यापार और प्रचार का माध्यम बनती जा रही है।
प्रभावहीनता और उपेक्षा का दौर
जहां एक समय पत्रकार की कलम से शासन-प्रशासन हिल जाया करता था, वहीं आज सोशल मीडिया की खबरों को तो छोड़िए, प्रिंट मीडिया की खबरों का भी कोई खास असर नहीं होता। अफसरशाही, माफियातंत्र और भ्रष्ट व्यवस्था ने ईमानदार पत्रकारों को घेरना शुरू कर दिया है। उन्हें न सुरक्षा है, न संरक्षण।
गिरते जीवन मूल्य और संवेदनहीन समाज
आधुनिकता के इस दौर में सामाजिक और मानवीय मूल्यों में लगातार गिरावट आई है। रिश्ते, संवेदना और नैतिकता पीछे छूटते जा रहे हैं। पत्रकारिता का उद्देश्य अब जनसेवा न होकर, आत्म प्रचार और आर्थिक लाभ बन गया है। वरिष्ठ पत्रकार, जिन्होंने निष्पक्षता और ईमानदारी के साथ समाज को दिशा दी, आज सोशल मीडिया की भीड़ में खो गए हैं।
पेड न्यूज़ और राजनीति की गिरफ़्त
राजनीति अब पत्रकारिता का मार्गदर्शक नहीं, बल्कि उसका मालिक बनने की कोशिश कर रही है। दलगत हित, व्यक्तिगत रंजिश और विज्ञापन आधारित रिपोर्टिंग ने पत्रकारिता की आत्मा को खोखला कर दिया है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अब पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ताधारी दल की प्रशंसा और विपक्ष की आलोचना तक सीमित होता जा रहा है।
क्या करें? – एक आत्मावलोकन की आवश्यकता
- पत्रकारिता को फिर से जनसेवा का माध्यम बनाना होगा।
- फेक न्यूज़ के खिलाफ कड़े कानून बनाने होंगे।
- सोशल मीडिया पत्रकारिता के लिए न्यूनतम आचार संहिता तय होनी चाहिए।
- सरकार को स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता के लिए सकारात्मक माहौल बनाना चाहिए।
- और सबसे ज़रूरी – जनता को यह तय करना होगा कि वह क्या पढ़े, क्या देखे और किस पर विश्वास करे।
निष्कर्ष
आज पत्रकारिता एक बिना धार की तलवार बनती जा रही है, जो दिखती तो है, पर असर नहीं करती।
यदि लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ को हमने इसी तरह कमजोर होने दिया, तो आने वाला समय न केवल स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए संकटपूर्ण होगा, बल्कि पूरे सामाजिक ढांचे को भी कमजोर कर देगा।
अब भी समय है — कलम को फिर से धार देने का, पत्रकारिता को फिर से जनमानस की आवाज़ बनाने का।

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