राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनाव कब होंगे? कहां फंसा कानूनी पेंच? RTI में निर्वाचन आयोग ने दिया ये जवाब

राजस्थान में पंचायती राज और नगरीय निकाय चुनावों को लेकर चल रही अनिश्चितता ने नया मोड़ ले लिया है। एक ओर जहां राज्य निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण का कार्यक्रम शुरू किया है, वहीं दूसरी ओर राजस्थान हाईकोर्ट की डबल बेंच ने सिंगल बेंच के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें सरकार को जल्द से जल्द चुनाव कराने और ग्राम पंचायतों में नियुक्त प्रशासकों को हटाने का निर्देश दिया गया था। 

इसी बीच, सूचना का अधिकार (RTI) के तहत पूछे गए सवालों का जवाब देने में आयोग की असमर्थता जताई है। इससे जनता और राजनीतिक दलों के बीच असंतोष बढ़ रहा है।

RTI में निर्वाचन आयोग का जवाब

 

राजस्थान कांग्रेस प्रवक्ता और अधिवक्ता संदीप कलवानिया ने RTI के तहत राज्य निर्वाचन आयोग से चार अहम सवाल पूछे थे। ये सवाल थे-

1. जिन ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों, जिला परिषदों, नगरपालिकाओं और नगर निगमों का पांच साल का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, उनके चुनाव कब कराए जाएंगे?
2. संविधान के अनुच्छेद 243 (e) और (u) की पालना सुनिश्चित करने के लिए आयोग ने क्या कार्यवाही की?

3, कार्यकाल समाप्त हो चुके निकायों के चुनाव के लिए आयोग का निर्णय क्या है?

4. कार्यकाल पूरा होने के बावजूद चुनाव न कराए जाने का कारण क्या है?

इन सवालों के जवाब में आयोग ने एक सामान्य और अस्पष्ट उत्तर दिया है। निर्वाचन आयोग ने कहा कि पंचायती राज संस्थाओं और नगरीय निकायों की मतदाता सूची के पुनरीक्षण का कार्यक्रम जारी हो चुका है। चुनाव प्रक्रिया प्रक्रियाधीन है।” आयोग ने यह भी बताया कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण का विस्तृत आदेश 22 अगस्त 2025 को उनकी आधिकारिक वेबसाइट (https://sec.rajasthan.gov.in/) पर उपलब्ध है। 

बता दें, यह जवाब न केवल सवालों का समाधान करने में विफल रहा, बल्कि इसने यह भी स्पष्ट कर दिया कि आयोग अभी तक चुनाव की तारीखों को लेकर कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाया है। जनता और राजनीतिक दलों ने कहा कि यह आयोग की लचर कार्यप्रणाली का एक और सबूत है।

हार के डर से चुनाव नहीं- संदीप कलवानिया 

इसको लेकर कांग्रेस प्रवक्ता और अधिवक्ता संदीप कलवानिया ने कहा कि नगरीय निकायों एवं पंचायतीराज संस्थाओ का पांच साल का कार्यकाल पूरा हो गया है, लेकिन सरकार परिसीमन एवं पुर्नगठन के नाम पर चुनाव टाल रही है। जबकि संविधान के अनुच्छेद 243 (ई) (यू) में पांच साल का कार्यकाल पूरा होने पर चुनाव करना आवश्यक है। भाजपा सत्ता आने के जनता से किए वादों में विफल है इसलिए हार के डर से चुनाव नहीं करवा रही है।

हाईकोर्ट का फैसला- सिंगल बेंच vs डबल बेंच 

 

इससे पहले 18 अगस्त 2025 को राजस्थान हाईकोर्ट की सिंगल बेंच, जस्टिस अनूप ढंढ़ की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया था। इस आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिया गया था कि वह जल्द से जल्द पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव कराए और ग्राम पंचायतों में नियुक्त प्रशासकों को हटाए। इस फैसले के बाद सरकार और आयोग पर दबाव बढ़ा था, इससे यह भी उम्मीद जताई गई थी कि लंबे समय से लटके चुनाव जल्द होंगे। 

हालांकि, राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ डबल बेंच में अपील दायर की। जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संजीत पुरोहित की डबल बेंच ने सरकार की दलीलें सुनने के बाद सिंगल बेंच के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद और अतिरिक्त महाधिवक्ता कपिल प्रकाश माथुर ने तर्क दिया कि सिंगल बेंच का आदेश अनुचित है, क्योंकि एक अन्य डबल बेंच पहले ही पंचायत चुनाव और परिसीमन से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई कर चुकी है, जिसका फैसला रिजर्व है। 

सरकार ने यह भी दलील दी कि याचिकाओं में केवल प्रशासकों के निलंबन और बर्खास्तगी को चुनौती दी गई थी, न कि जल्द चुनाव कराने की मांग की गई थी। डबल बेंच ने इन तर्कों को स्वीकार करते हुए सिंगल बेंच के आदेश को स्थगित कर दिया, जिससे चुनाव प्रक्रिया में और देरी की संभावना बढ़ गई है

मतदाता सूची और परिसीमन की चुनौतियां 

राज्य निर्वाचन आयोग ने 22 अगस्त 2025 को पुराने परिसीमन के आधार पर मतदाता सूची तैयार करने का शेड्यूल जारी किया था। इस शेड्यूल के अनुसार, ड्राफ्ट वोटर लिस्ट 26 सितंबर 2025 तक प्रकाशित होनी थी, जबकि अंतिम सूची 29 अक्टूबर 2025 तक तैयार होनी थी। हालांकि, डबल बेंच के अंतरिम आदेश ने इस प्रक्रिया पर अनिश्चितता के बादल मंडरा दिए हैं।

 

विशेषज्ञों का मानना है कि नए परिसीमन के आधार पर पंचायतें और निकाय अस्तित्व में आ चुके हैं और कोर्ट के आदेश के बाद आयोग को अपने कार्यक्रम में संशोधन करना पड़ सकता है। इसके अलावा, निर्वाचन आयुक्त मधुकर गुप्ता का कार्यकाल भी समाप्त हो गया है। राजेश्वर सिंह को नया आयुक्त बनाया गया है।

जनता की बेचैनी और राजनीतिक सरगर्मी 

चुनावों में देरी से जनता में असंतोष बढ़ रहा है। ग्राम पंचायतों और नगरीय निकायों में प्रशासकों के जरिए कामकाज चल रहा है, लेकिन जनता का मानना है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के बिना लोकतंत्र की भावना कमजोर हो रही है। दूसरी ओर, राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश शुरू कर दी है। कांग्रेस ने सरकार और आयोग की निष्क्रियता पर सवाल उठाए हैं, जबकि बीजेपी ‘वन स्टेट, वन इलेक्शन’ के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश में है।

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