जनता की मांग आधे दशक से ठंडी फाइलों में दबी, अब तो चमत्कार का इंतजार
ठहराव की मांग या ठहराव की मज़ाक?
रामगढ़ शेखावाटी में ब्रॉड गेज लाइन शुरू हुए कई साल हो गए, लेकिन लंबी दूरी की ट्रेनों का ठहराव आज भी सपना बना हुआ है। जनता बार-बार मांग उठाती है, ज्ञापन देती है, धरना करती है, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। ऐसा लगता है जैसे रेलवे विभाग और नेताओं के लिए रामगढ़ वासी कोई “दूसरे दर्जे के यात्री” हों।
बिसाऊ की दावत, रामगढ़ के हिस्से तमाचा
पूर्व सांसद नरेंद्र खींचड़ ने रेल मंत्रालय में मांग तो उठाई, लेकिन जब ठहराव बिसाऊ में मिल गया और रामगढ़ को खाली हाथ रहना पड़ा, तब लोगों ने समझ लिया कि नेताओं की नज़र में रामगढ़ की अहमियत कितनी है। यह फैसले जनता के लिए सीधे-सीधे अपमान जैसे थे।
संघर्ष समिति के प्रयास: प्रशंसा तो खूब, असर ज़ीरो
कमलेश अग्रवाल और मुजम्मिल भाटी जैसे लोग संघर्ष समिति के बैनर तले पूरी शिद्दत से कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उनकी मेहनत का फल सिर्फ “रेलवे विभाग के कागज़ात” बनकर रह गया है। असली ठहराव का आदेश रेल मंत्रालय से आना है, और वहां तक पहुंचने वाला रामगढ़ का कोई नहीं।
नेताओं की गाड़ियां और प्रवासियों के प्लेन
रामगढ़ की सबसे बड़ी विडंबना यही है—यहां ऐसे नेता और प्रवासी तो बहुत हैं जिनके पास महंगी गाड़ियां और हवाई जहाज़ की टिकटें हैं, लेकिन रेल की चिंता करने वाला कोई नहीं। नेताओं को ट्रेन से सफर करने की ज़रूरत नहीं, प्रवासियों को जब भी आना होता है, वे सीधा प्लेन पकड़ लेते हैं। ऐसे में “रेल ठहराव” की मांग उनके लिए न गले की हड्डी है, न पेट की भूख।
सांसद का सवाल और राजनीतिक बिसात
हाल ही में कांग्रेस सांसद बृजेंद्र ओला ने संसद में मुद्दा उठाया, लेकिन जानकारों का कहना है कि इसका उल्टा असर पड़ सकता है। आज की राजनीति में विपक्ष का सुझाव सुनना सरकार के लिए मजबूरी नहीं, बल्कि मज़ाक का विषय बन चुका है। यानी जनता की उम्मीद यहां भी धराशायी।
जब तीनों सांसद भी चुप रहे तो अब किससे उम्मीद?
जब सीकर, चुरु और झुंझुनू तीनों संसदीय सीटों पर भाजपा का कब्जा था, तब भी रामगढ़ को रेल ठहराव नसीब नहीं हुआ। अब हालात और भी बुरे हैं। जनता समझ चुकी है कि यहां कोई ऐसा नेता नहीं, जो जनता की तकलीफ़ को रेल मंत्रालय तक पहुंचाने का साहस दिखा सके।
पर्यटन का बहाना भी बेअसर
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा शेखावाटी की हवेलियों और छतरियों के संरक्षण में रुचि ले रहे हैं। लेकिन पर्यटन के नाम पर भी अगर रामगढ़ को रेल ठहराव न मिले, तो समझ लीजिए कि रामगढ़ की किस्मत में “रेल से ठगा जाना” ही लिखा है।
लोकल ट्रेनें भी गिनती की
लंबी दूरी की ट्रेनों का सवाल छोड़िए, लोकल डेमो ट्रेनों की संख्या भी ऊंट के मुंह में जीरा जैसी है। रोज़ाना सफर करने वाले यात्री ठसाठस भीड़ में सफर करने को मजबूर हैं, लेकिन किसी को फर्क नहीं पड़ता।
निष्कर्ष : रामगढ़ वासियों का भरोसा अब “चमत्कार” पर
रामगढ़ में लंबी दूरी की रेलगाड़ियों का ठहराव अब मुद्दा नहीं रहा, बल्कि मज़ाक बन गया है। नेताओं के लिए यह सिर्फ भाषण का मसाला है, प्रवासियों के लिए अप्रासंगिक विषय और रेलवे के लिए “टालू जवाब”। आम जनता बस इंतज़ार कर रही है—किसी चमत्कार का।
क्योंकि हकीकत यही है: रामगढ़ की ट्रेनें चलती तो हैं, लेकिन उम्मीदें वहीं स्टेशन पर छूट जाती हैं।

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