कैंसर पीड़िता को बस से उतारा : सिस्टम की संवेदनहीनता से इंसानियत शर्मसार,सिस्टम पर उठे सवाल

कैंसर पीड़िता को बस से उतारा : सिस्टम की संवेदनहीनता से इंसानियत शर्मसार,सिस्टम पर उठे सवाल

झुंझुनूं: कैंसर से जूझ रही एक बुजुर्ग महिला को झुंझुनूं रोडवेज बस डिपो पर अमानवीय व्यवहार का सामना करना पड़ा। महज टिकट न होने के कारण उन्हें चलती बस से उतार दिया गया, जबकि नियमानुसार गंभीर रूप से बीमार यात्रियों को बस में ही टिकट देने की सुविधा है। इस घटना ने रोडवेज प्रशासन की कार्यप्रणाली और मानवीय संवेदनाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बीमारी से जूझती सुमित्रा देवी, बस में बैठना बना ‘अपराध’

शुक्रवार सुबह करीब आठ बजे झुंझुनूं रोडवेज बस स्टैंड पर यात्रियों की भीड़ हमेशा की तरह थी। इसी भीड़ में मलसीसर निवासी 58 वर्षीय सुमित्रा देवी भी थीं, जिनकी चाल बेहद धीमी थी और शरीर थका हुआ लग रहा था।

कुछ लोग उन्हें सहारा देकर बस स्टैंड तक लाए थे। पता चला कि सुमित्रा देवी कैंसर से पीड़ित हैं और हाल ही में उनका ऑपरेशन हुआ है। वे झुंझुनूं से अपने गांव मलसीसर लौट रही थीं। 

झुंझुनूं से चंडीगढ़ जाने वाली सीकर डिपो की एक रोडवेज बस में चढ़ने की कोशिश करते हुए, सुमित्रा देवी ने परिचालक से कहा कि वह खड़ी नहीं हो सकतीं और उनके साथ आया व्यक्ति टिकट लेने जा रहा है।

उन्होंने अनुरोध किया कि उन्हें पहले बस में बैठने दिया जाए और टिकट थोड़ी देर में ले लिया जाएगा। लेकिन परिचालक ने उनकी एक न सुनी। उसने कठोरता से कहा, “बिना टिकट नहीं बैठा सकते, उतर जाओ।

परिचालक ने कई यात्रियों के सामने सुमित्रा देवी को बस से उतार दिया। वह करीब 20 मिनट तक बस के बाहर खड़ी रहीं – थकी हुई, असहाय और कमजोर। न आसपास के अधिकारियों ने कोई टिप्पणी की, न कर्मचारियों ने कोई मदद की। लोग खड़े होकर तमाशा देखते रहे।

सिस्टम ने तोड़ी इंसानियत की रीढ़: नियमों की अनदेखी

रोडवेज नियमों के अनुसार, गंभीर रूप से बीमार यात्रियों को टिकट देने की सुविधा बस में ही उपलब्ध है। विशेष तौर पर कैंसर पीड़ित यात्रियों को किराये में छूट भी दी जाती है, और उन्हें टिकट काउंटर पर खड़े रहने की अनिवार्यता भी नहीं होती। लेकिन झुंझुनूं रोडवेज पर स्थिति बिल्कुल उलट है। वहां पिछले तीन महीने से दिल्ली जाने वाली बसों के लिए टिकट काउंटर बंद है। यात्री जब बस में बैठते हैं, तभी कंडक्टर टिकट जारी करता है। ऐसे में सुमित्रा देवी ने कोई गलती नहीं की थी।

सवाल यह उठता है कि फिर भी उन्हें बस से क्यों उतारा गया? क्या एक कैंसर पीड़िता की गुहार पर भी सिस्टम की संवेदनहीनता भारी पड़ गई?

सुमित्रा देवी की व्यथा: “मैं रोती रही, कोई नहीं सुना”

इस घटना पर सुमित्रा देवी ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा, “मैं इलाज करवा कर आ रही थी, शरीर में ताकत नहीं थी, बस में चढ़ी तो कंडक्टर बोला उतर जा। मैंने कहा – बेटा, बैठने दे, टिकट वाला आ रहा है। मगर उसने उतरने को मजबूर कर दिया। मैं बाहर खड़ी रही। बहुत बुरा लगा। रोई भी, पर किसी को फर्क नहीं पड़ा।

रोडवेज प्रशासन की प्रतिक्रिया: कार्रवाई का आश्वासन

जब इस मामले को लेकर झुंझुनूं रोडवेज के चीफ मैनेजर गिरिराज स्वामी से बात की, तो उन्होंने घटना पर खेद व्यक्त किया। स्वामी ने कहा, “मुझे यहां ज्वाइन किए हुए अभी 5 दिन ही हुए हैं। मैं रोज रात तक यहां रुकता हूं ताकि आमजन को कोई दिक्कत न हो। अगर महिला को बस से उतारा गया है तो यह निंदनीय है। संबंधित कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

काउंटर बंद, यात्रियों की परेशानी जारी

यह केवल सुमित्रा देवी की नहीं, बल्कि झुंझुनूं रोडवेज पर सैकड़ों यात्रियों की समस्या है। पिछले तीन महीने से कई टिकट काउंटर बंद है। टिकट काउंटर नहीं खुलने की वजह से लोगों को समय पर टिकट नहीं मिलते, खासकर बुजुर्ग और बीमार लोगों को काफी परेशानी होती है। एक नियमित यात्री ने बताया, “हम रोज सफर करते हैं, पर काउंटर बंद रहता है। जो बीमार या कमजोर लोग होते हैं, वे कैसे खड़े रहें इतने देर? हर बात पर बहाना बना देते हैं – स्टाफ नहीं है, नेटवर्क नहीं है, सर्वर डाउन है। लेकिन कार्रवाई कुछ नहीं होती। 

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