गया/कोलकाता (विशेष संवाददाता)। गया जी में चल रहे पितृपक्ष श्राद्ध पर्व के अंतर्गत आज नवें दिन सीता कुंड पर विधिविधान से श्राद्ध सम्पन्न हुआ। नीमकाथाना निवासी एवं वर्तमान में कोलकाता प्रवासी कपिल कुमार अग्रवाल व उनकी धर्मपत्नी ने पंडित विनोद मुद्गल के सानिध्य में अपने पितरों के लिए श्रद्धा अर्पित की।
सीता कुंड, जो फल्गु नदी के किनारे स्थित है और जहां राम-लक्ष्मण के साथ सीता जी का मंदिर भी विराजमान है, वहां श्राद्धकर्म का आयोजन किया गया। इस अवसर पर परंपरा अनुसार बालू के पिंडों का दान महिलाओं द्वारा किया गया। तत्पश्चात सौभाग्य पिटारे एवं अन्य धार्मिक दान सामग्री भी समर्पित की गई।
पंडित मुद्गल ने बताया कि सीता कुंड का विशेष धार्मिक महत्व है, यहां किया गया श्राद्ध पितरों को मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है।
गयाजी में सीता कुंड श्राद्ध करना एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जिसका विशेष महत्व है। यहाँ श्राद्ध करने के पीछे एक पौराणिक कथा है, जिसके अनुसार माता सीता ने यहाँ पर राजा दशरथ का पिंडदान किया था। इसी कारण इस स्थान को पिंडदान के लिए बहुत पवित्र माना जाता है।
गयाजी में सीता कुंड पर श्राद्ध करने की विधि कुछ इस प्रकार है:
1. स्थान और विधि:
सीता कुंड, फल्गु नदी के किनारे स्थित है।
यहाँ पर पिंडदान मुख्य रूप से बालू (रेत) से किया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि माता सीता ने फल्गु नदी के बालू से ही राजा दशरथ का पिंडदान किया था।
पिंडदान करने वाले लोग अक्सर दुकानें से बालू खरीदते हैं, क्योंकि फल्गु नदी में रबर डैम बनने के कारण नदी का बालू मिलना कठिन हो गया है।
2. श्राद्ध का महत्व:
सीता कुंड पर बालू का पिंडदान करने से पितरों को स्वर्ग और अक्षय लोक की प्राप्ति होती है।
मान्यता है कि गयाजी में पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष मिलता है और 108 कुलों और 7 पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है।
यहाँ श्राद्ध करने से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त हो जाता है।
3. मातृ नवमी का विशेष महत्व:
मातृ नवमी के दिन सीता कुंड पर केवल महिलाएं तर्पण और पिंडदान करती हैं।
महिलाएं पहले सीता कुंड में स्नान करती हैं, फिर सीता मैया, राम और लक्ष्मण का पूजन करती हैं, और उसके बाद अपने पूर्वजों को जल और पिंडदान अर्पित करती हैं।
4. अन्य अनुष्ठान:
सीता कुंड के पास कई प्राचीन मंदिर भी हैं, जहाँ भगवान राम और माता सीता के चरण चिन्ह भी मौजूद हैं।
पिंडदान करने के बाद, सौभाग्य पिटारी (सुहाग का सामान) दान करने की भी परंपरा है।
गयाजी में श्राद्ध का पूरा अनुष्ठान कई दिनों तक चलता है, और सीता कुंड उनमें से एक प्रमुख पिंड वेदी है।
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