हठधर्मिता या लापरवाही? रामगढ़ में गंदे पानी का फैलता संकट

हठधर्मिता या लापरवाही? रामगढ़ में गंदे पानी का फैलता संकट

रामगढ़ शेखावाटी में नगर पालिका प्रशासन की कार्यशैली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। श्री कृष्ण गौशाला की बीड़, किसानों के खेतों और बावला गांव तक जाने वाले मार्ग पर फैला गंदा पानी केवल एक प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का प्रतीक बन चुका है।

सवाल यह है कि जब 3 जून 2022 को नगर पालिका और गौशाला प्रबंधन के बीच स्पष्ट शर्तों के साथ लिखित करार हुआ था — जिसमें परिशोधित पानी को सुरक्षित नालों एवं पक्के टैंकों के माध्यम से छोड़े जाने की सहमति बनी — तो आखिर उन शर्तों का पालन क्यों नहीं हुआ?

क्या करार महज़ कागज़ी औपचारिकता था?
क्या सुरक्षित टैंक बनाना प्रशासन की प्राथमिकता में कभी शामिल ही नहीं था?

वास्तविकता यह है कि सुरक्षित संरचनाओं के स्थान पर कच्चे गड्ढों और अस्थायी टैंकों का सहारा लिया गया। नतीजा वही, जिसकी आशंका पहले दिन से थी — बार-बार टूटते कच्चे डेम, खेतों में भरता दूषित पानी, पर्यावरणीय जोखिम और गोवंश के लिए जानलेवा परिस्थितियाँ।

यह स्थिति केवल तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि निर्णय स्तर पर गंभीर उदासीनता का परिणाम प्रतीत होती है।

ग्रामीणों का आक्रोश यूँ ही नहीं है।
किसानों की क्षति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि आजीविका पर सीधा प्रहार है।
गौशाला क्षेत्र में फैलता प्रदूषण केवल स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि पर्यावरणीय दायित्वों की खुली अनदेखी है।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि गौशाला प्रबंधन द्वारा विधिक नोटिस, करार समाप्ति एवं अनेक स्मरण पत्र दिए जाने के बावजूद समस्या जस की तस बनी रही। यदि चेतावनियाँ, नोटिस और करार भी प्रशासन को नहीं जगा पाएँ, तो इसे क्या कहा जाए?

लापरवाही? या हठधर्मिता?

बार-बार कच्चे टैंक टूटना अब दुर्घटना नहीं, बल्कि पूर्वानुमेय परिणाम बन चुका है। इसके बावजूद स्थायी समाधान का अभाव प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

प्रशासन को समझना होगा कि यह मुद्दा केवल पानी निकासी का नहीं, बल्कि —
✔ सार्वजनिक स्वास्थ्य
✔ पर्यावरण संरक्षण
✔ पशु सुरक्षा
✔ किसानों के अधिकार
से जुड़ा हुआ है।

अब समय आ गया है कि नगर पालिका प्रशासन त्वरित, पारदर्शी और स्थायी समाधान प्रस्तुत करे। अन्यथा, जनता के मन में उठते प्रश्न और आक्रोश दोनों ही गहराते जाएंगे।

 

क्योंकि अंततः —
समस्या से अधिक खतरनाक है, समस्या के प्रति प्रशासन की चुप्पी।

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